Saturday, 25 February 2012

आज फिर से उनकी याद आयी.....

वो आज याद आयी और खयालो में ही चली गयी
उस एक पल के यादो में भी मुझे रुला के चली गयी
किया था उम्मीद उनसे फूलो का मैंने
रहो में वो कांटे बिछा के चली गयी

सपनो की एक दुनिया बनाया था उनके साथ
उसी दुनिया को गम से भर के गयी
जलाया था दिया उनके इंतजार में
उसी से मेरी दुनिया जला गयी


भूल के भी न भूलने की दी थी कसम मुझे
आज वो मुझे भुला के चली गयी
अब तो ये प्यास न बुझता है किसी से
जो आग वो लगा के चली गयी

रघुवर झा

Saturday, 24 December 2011

बस प्यार ही काफी

शादीशुदा जिंदगी में अक्सर दो मुश्किलें आती हैं एक तो रिश्ते में पहले जैसी गर्माहट नहीं रहती और दूसरा घर में अनबन होना आम बात हो जाती है. कई लोग अपनी शादीशुदा जिंदगी को सही तरह से चलाने के लिए कई तरह के काम करते हैं. कोई पूजा करवाता है तो कोई अपनी पत्नी का पुजारी बन जाता है, कोई पत्नी अपने अच्छे भले कॅरियर को छोड़कर पतिदेव की सेवा में लग जाती है. तमाम कर्मकाण्ड करने के बाद भी रिश्तों में अनबन जारी रहती है.
 लेकिन तमाम जुगाड़ लगाने के बाद भी लोग एक एक्स फैक्टर को भूल जाते हैं जिसके सहारे दुनिया के सारे रिश्ते चलते हैं और वह है प्यार. प्यार एक ऐसा अहसास है जो हर कमी को पूरा कर देता है. प्यार किसी बेसहारा को भी सहारा देने में सक्षम होता है. शादी के बाद अधिकतर पत्नियों का यही कहना होता है कि अगर उनके पति सिर्फ उनसे सच्चा प्यार ही करें तो उनके लिए उतना ही काफी है.

पतियों की भी यही इच्छा है कि उनकी पत्नी उनसे चन्द मिनट प्यार से बात करे ताकि वह दिन-भर की थकान और भूख प्यास को भूल जाएं.

प्यार एक ऐसा एक्स फैक्टर है जो आपकी शादीशुदा जिंदगी में ना सिर्फ नया रंग भर देगा बल्कि आपकी गाड़ी को सालों तक के लिए जवां कर देगा. प्यार का मतलब यहां बिस्तर में साथ सोना नहीं बल्कि वह छोटी छोटी बातें हैं जिनसे किसी को खुशी मिलती है जैसे छुट्टी वाले दिन पतिदेव का पत्नी के कामों में हाथ बंटाना, पति जब काम से घर लौटे तो पत्नी का उसे पानी देना और हालचाल पूछ्ना. वरन् पति द्वारा कभी-कभी सप्राइज गिफ्ट देना जैसे छोटे-छोटे कामों से भी आपकी जिंदगी में प्यार बना रहेगा.

रिश्तों में प्यार की अहमियत को नजरअंदाज मत करिए. हर रिश्ता प्यार की बुनियाद पर ही बना होता है जिसे जितना प्यार मिले वह उतना बढ़ता है.

Friday, 9 December 2011

पीने का बहाना

हमें तो बहाना चाहिए पीने के लिए
एक और घूंट चाहिए जिंदगी जीने के लिए
गम में पीतें है हम, की दुनिया भुला दें
खुसी में पिता तो मजा ही निराली होती

हम पिने वाले ही जानते है  पिने का मजा
जिसने नहीं पिया शराब उसका जीना भी क्या जीना
पीने के बाद जो मैंने छू लिया तारो को
मन तो बस दीवाना सा हो गया है


शराब पीना श्वास्थ के लिए हानिकारक है
कभी तुम भी नशे में झूम के चल के देखना
अपने डगमगाते कदम का मजा ले के देखो
अपनों ने तो ज़माने भर का ठोकर दिया
पर ज़ख्मो से अब नहीं डरता अब ये परवाना

जब प्यार में पाया बेवफाई,
जिन्दगी मैंने जाम से पाई
जब से शुरू किया मैंने पीना
ये तो बन गया मेरे खुसी का अफशाना

पीना ही है मेरे सुख दुःख का साथी
जिसे मेरे सिवा मेरे दुनिया से कुछ लेना नहीं
शराब का प्याला मैंने हाथो में लिया
अपने गमो को भूलता चला गया

रघुवर झा

Sunday, 20 November 2011

अब आप ही बताओ की मैं क्या लिखूं .....

अपनी कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या अपने दिल का सारा प्यार लिखूँ..

अपना कुछ ज़ाज़बात लिखूँ या अपने सपनो की सौगात लिखूँ..
खिलता सुरज को मैं आज लिखूँ या आपका चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ..

वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..
वो पल मे बीते कुछ साल लिखूँ या सादियो से लम्बी रात लिखूँ..

सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..
मै आपको अपने पास लिखूँ या आपके दूरी का ऐहसास लिखूँ..

वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या आपका निश्छल प्यार लिखूँ..
छत पे चढ़ बारिश मेँ भीगूँ या मैं रोज की रातों की
आंखों की बरसात लिखूँ..
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..या दिल का सारा प्यार लिखूँ..
                             अब आप ही बताओ की मैं क्या लिखूं .....
रघुवर झा

Tuesday, 15 November 2011

ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है


ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है,
जैसे कोई रेल चलती जा रही है,

मन लगा है स्वयं से नज़रें चुराने,
रुक गया है प्लेटफोर्म पर पुराने,
तन का सिग्नल लाल करती जा रही है,

खेत नदिया ताल पोखर छूटते हैं,
पटरियों पर कितने पत्थर टूटते हैं,
काल की भी दाल गलती जा रही है,

इक भिखारी गीत गाने में लगा है,
एक मोटू लाल खाने में लगा है,
धूप है, बत्ती भी जलती जा रही है,

है थकन से चूर मंजिल पाएगी ही,
आएगी मंजिल, कभी तो आएगी ही,
मन में कोई आस पलती जा रही है,

ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है,
जैसे कोई रेल चलती जा रही है.

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
(डा.  हरिवंश  राय  बच्चन )

Saturday, 12 November 2011

जिंदगी से अनमोल कुछ नहीं

लोगों को मौत के बारे में बातें करते सुना है, बड़ी शान से कहते है कि मौत जीवन का सत्य है। एक दिन तो वह जरूर आएगी। माना कि वह एक दिन आएगी जरूर। पर क्या जरूरी है कि हंसती-मुस्कराती जिंदगी में मौत की चर्चा करना। अगर मौत से इतना ही प्यार है तो फिर इतनी मारा-मारी क्यों? जब एक ना एक दिन सबको मौत ने अपने साथ ले ही जाना है, तो फिर क्यों ये महल, चौबारे, पैसे के पीछे अंधी दौड , यह सब मेरी समझ से बाहर की बात है। इतने विद्वान और योग्य व्यक्तियों की समझ में जरा सी बात नहीं आती है कि वह क्यों इंसान को परलोक सुधारने के उपदेश देते है, जबकि सबसे बडा सत्य है कि जिंदगी से अनमोल और कुछ नहीं है। आजकल यह भी देखा जाता है कि लोग जान-बूझ कर जीवन से खिलवाड कर रहे है। मौत को समय से पहले आने का निमंत्रण दे रहे है। कुछ सक्षम, प्रभावशाली व्यक्तियों का जीवन साधारण जनता से ज्यादा कीमती हो गया है, तभी तो वह अपने को सुरक्षा कर्मियों के घेरे में सुरक्षित समझ किसी के लिए कुछ भी कह देते है। उनके बयानों के फलस्वरूप जब धमाके होते है, तो मारे जाते है निर्दोष प्राणी। हमारा सिस्टम इतना चरमरा गया है कि जैसे खटारा गाडिया, जो कभी भी कही पर भी दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है और फिर एक खबर आती है फलां दुर्घटना या बम धमाकों में इतने मरे। इस बात की जानकारी बड़ी शान से वातानुकूलित कक्ष में बैठकर मीडिया के सामने दी जाती है कि देखो हमारा सिस्टम कितना आधुनिक हो गया है कि दुर्घटना के चंद मिनटों बाद ही प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हो रही है। यह सिस्टम की खामी ही तो है कि नौसिखिए चालकों को किस प्रकार से इतने बेकसूर लोगों की जान से खेलने की जिम्मेदारी दी गई। दूसरी ओर हमारे सिस्टम की सबसे बडी खूबी यह है कि हमने फलां शहर के फलां मौहल्ले में इस संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। इसके बारे में पूरी मालूमात की जा रही है, पता लगाया जा रहा है कि यह कहां-कहां मौत बांटने आया था। जबकि दूसरी ओर बडे-बडे बम धमाकों के मुखय आरोपियों को शाही अंदाज में जीवन व्यतीत करने की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही है। मेरी समझ में यह भी नहीं आता है कि आखिर हमारे सिस्टम को चलाने वाले जीवन बचाने की कवायद में लगे है या फिर जीवन को खत्म करने के लिए मौत को बुलाने का प्रयास कर रहे है। एक ओर कृषि प्रधान देश में आम जनता रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रही है तो दूसरी ओर हमारे नेता अपने हित साधने के प्रयास में लगे है। हर नेता अपनी हैसियत के मुताबिक घोटाले करने में मस्त है, और आज का सच कहने में एक्सपर्ट मीडिया भी इनकी नीतियों को समझ में नाकाम साबित हो रही है या फिर मीडिया अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से दूर भाग रही है और आम आदमी समय से पहले मौत की ओर जा रहा है। अजीब सा डर मन में बैठा रहता है कि घर से निकल तो जरूर रहे है, पर क्या वापस घर लौट पाएंगे? हर तरफ दहशत का माहौल बना हुआ है। सामाजिक व्यवस्थाओं को सुचारू ढंग से चलाने वाले अपनी नैतिक जिम्मेदारियों को कब ईमानदारी से निभाएगे? यह सवाल हमेशा मन को परेशान रखता है और इसी परेशानी में समय गुजरता जा रहा है? क्या कभी यह सब ठीक हो पाएगा या फिर ऐसे ही…….?